गणतंत्र दिवस पर बुजुर्ग की व्यथा, बेटों ने घर से निकाला, आश्रम ने दी पनाह, बच्चों को ला कर देता था तिरंगा

पूरा देश 75 वा गणतंत्र दिवस मना रहा है और आजादी के इस अमृत महोत्सव पर देश की प्रगति को खुली आंखों से देखा जा सकता है लेकिन आज भी कई ऐसे लोग हैं जिनकी व्यथा हम खुली आंखों से देख नहीं सकते। गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक ऐसी खबर सुनने को मिले जिससे मन काफी दुखी हुआ।

ताज नगरी बलकेश्वर के रहने वाले एक बुजुर्ग को उनके बेटों ने घर से निकाल दिया जिसके बाद वह बुजुर्ग वृद्ध आश्रम में रहने के लिए मजबूर हो गए। लेकिन गणतंत्र दिवस के साथ उस बुजुर्ग की कुछ यादें जुड़ी हुई है। वह यादें उस बुजुर्ग के बेटों के बचपन से जुड़ी हुई है इसीलिए वह बुजुर्ग फूट-फूट कर रोने लगा।

गणतंत्र दिवस पर बुजुर्ग की व्यथा, बेटों ने घर से निकाला, आश्रम ने दी पनाह, बच्चों को ला कर देता था तिरंगा
गणतंत्र दिवस पर बुजुर्ग की व्यथा, बेटों ने घर से निकाला, आश्रम ने दी पनाह, बच्चों को ला कर देता था तिरंगा

75 वर्ष की उम्र में बैठो ने निकाला घर से

देश के 75 वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर सुरेश कुमार नाम के एक 75 वर्ष के बुजुर्ग को उनके बेटों ने अपने घर से निकाल दिया। वह बुजुर्ग अपने लड़खड़ाते हुए कदमों से सिर पर छत ढूंढते ढूंढते रामलला वृद्ध आश्रम की शरण में पहुंच गए। वृद्ध आश्रम में पहुंचते ही किसी ने उन्हें देखा और अंदर आने के लिए कहा उनके नाम सुरेश कुमार जैसे ही खुद आश्रम के अंदर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां पर और भी काफी सारे बुजुर्ग मौजूद थे जिन्हें उनके परिवार वालों ने घर से बेदखल कर दिया था और वह वृद्ध आश्रम की शरण में आए थे। उन सभी विरुद्ध लोगों को देखकर सुरेश कुमार काफी भावुक हो गए और खुद की व्यथा पर भी रोने लगे।

गणतंत्र दिवस पर बुजुर्ग की व्यथा, बेटों ने घर से निकाला, आश्रम ने दी पनाह, बच्चों को ला कर देता था तिरंगा
गणतंत्र दिवस पर बुजुर्ग की व्यथा, बेटों ने घर से निकाला, आश्रम ने दी पनाह, बच्चों को ला कर देता था तिरंगा

ठीक से खाना भी नहीं खिलाते थे बेटे

सुरेश कुमार ने वृद्ध आश्रम में आकर बताया कि उन्हें उनके बेटों ने घर से बेदखल कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने उनके बेटों के बचपन का किस्सा याद करते हुए बताया कि वह हर गणतंत्र दिवस पर उनके बच्चों के लिए तिरंगे झंडे लेकर आते थे और उनके बच्चे काफी खुश हो जाते थे। लेकिन आज के इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्हें वह सारी बातें याद आ रहे हैं जिस पर उन्हें काफी रोना आ रहा था। सुरेश कुमार ने बताया कि उनके बेटे उन्हें बिल्कुल भी सुख नहीं देते थे और उनसे बात तक नहीं करते थे। यहां तक कि खाना देने के लिए भी उनके बेटे एक दूसरे की राह देखते थे। कभी-कभी तो सुरेश कुमार को भूखे पेट ही सोना पड़ता था।

आश्रम में पहुंचकर खुश है सुरेश कुमार

सुरेश कुमार ने बताया कि वह घर के किसी कोने में बैठ कर अकेले ही रोते थे। वे उन सारी बातों को याद करते थे जो उन्होंने उनके बच्चों के सुख और खुशियों के लिए की। लेकिन आप जब यह मुद्दा शरण में आ गए हैं तो यहां पर उनके और भी काफी विरुद्ध दोस्त बन चुके हैं और वह थोड़ा अच्छा महसूस कर रहे हैं।

रामलला वृद्ध आश्रम के संचालक शिव प्रसाद शर्मा ने बताया कि सुरेश कुमार के आने के बाद उन्हें रहने के लिए एक कमरा दिया गया है। इसके साथ ही कई बुजुर्ग मंडलियों में वे शामिल हो गए हैं और हर शाम को भजन संध्या में भी वे शामिल हुए और उनके मन का काफी मनोरंजन हुआ।

About the Author: Rani Patil

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